(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.195. अध्यायः 195
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति जापकोपाख्यानकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-195-0x(5968)(72714)
गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथिता जापकेष्विह।
एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि॥ 12-195-1(72715)
भीष्म उवाच। 12-195-2x(5969)
शृणु वहितो राजञ्जापकानां गतिं विभो।
यथा गच्छन्ति निरयमनेकं पुरुषर्षभ॥ 12-195-2(72716)
यथोक्तमेतत्पूर्वं यो नानुतिष्ठति जापकः॥
एकदेशक्रियश्चात्र निरयं स निगच्छति॥ 12-195-3(72717)
अवमानेन कुरुते न तुष्यति न शोचति।
ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशयः॥ 12-195-4(72718)
अहंकारकृतश्चैव सर्वे निरयग्रामिनः।
परावमानी पुरुषो भविता निरयोपगः॥ 12-195-5(72719)
अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहितः।
यत्रास्य रागः पतति तत्रतत्रोपपद्यते॥ 12-195-6(72720)
अथैश्वर्यप्रसक्तः सञ्जापको यत्र रज्यते।
स एव निरयस्तस्य नासौ तस्मात्प्रमुच्यते॥ 12-195-7(72721)
रागेण जापको जप्यं कुरुते यश्च मोहितः।
यत्रास्य रागः पतति तत्र तत्रोपजायते॥ 12-195-8(72722)
दुर्बुद्धिरकृतप्रज्ञश्चले मनसि तिष्ठति।
फलस्यापचितिं याति निरयं चाधिगच्छति॥ 12-195-9(72723)
अकृतव्रज्ञको बालो मोहं गच्छति जापकः।
स मोहान्निरयं याति यत्र गत्वाऽनुशोचति॥ 12-195-10(72724)
दृढग्राही करोमीति जाप्यं जपति जापकः।
न संपूर्णो न वा युक्तो निरयं सोऽधिगच्छति॥ 12-195-11(72725)
अनिमित्तं परं यत्तदव्यक्तं ब्रह्मणि स्थितम्।
तद्भूतो जापकः कस्मात्सशरीरमिहाविशेत्॥ 12-195-12(72726)
दुष्प्रज्ञानेन निरया बहवः समुदाहृताः।
प्रशस्तं जापकत्वं च दोषाश्चैते तदात्मकाः॥ ॥ 12-195-13(72727)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 195॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-195-1 यतीनामिति ध. पाठः॥ 12-195-2 एतत्सर्वं य इति ट. पाठः॥ 12-195-3 अपूर्णाङ्गजपपर इत्यर्थः॥ 12-195-4 अवमानेनाश्रद्धया। जपे प्रीत्यादिरहितः॥ 12-195-5 अहंकारकृतो दर्पवन्तः। पुरुषो जापकः॥ 12-195-6 अभिध्याफलाभिसन्धिः। यत्र फले रागः प्रीतिस्तत्र तत्फलभोगनिमित्तमुपपद्यते योग्यं देहं प्राप्नोति॥ 12-195-7 स एवतत्र रागएव॥


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